नदियाँ बचाएँ – नदी दिवस 2025 और अविरल नदियों का महत्व
नमस्कर दोस्तो मैं भूपेन्द्र दाहिया, एक ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाला ब्लॉग लेखक और सामाजिक चिंतक हूँ। अपने अनुभवों और समाज के परिवेश को लेखों के माध्यम से साझा करना मेरा उद्देश्य है। मेरा विश्वास है कि गाँव की मिट्टी, परंपरा और शिक्षा — तीनों मिलकर ही असली भारत का निर्माण करते हैं।
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| नदियाँ बचाएँ |
पद्मश्री सम्मानित श्री बाबूलाल दाहिया जी।
वे एक सम्मानित कृषक, कवि और लेखक हैं, जिन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि मिट्टी से जुड़ा इंसान भी शब्दों की दुनिया में अमर हो सकता है। उनकी कविताएँ हमें धरती से जोड़ती हैं, और उनकी सोच हमें यह सिखाती है कि परंपरा और प्रगति दोनों साथ-साथ चल सकती हैं।
“एक दिन जब मैं गुजरात में रहते हुए एक गांव गया था अपने कुछ मित्रों के साथ नदी के किनारे खड़े नदी का प्रकृति नजारा बहुत सुंदर लगा रहा था नदी के पास खड़ा था, तो मुझे बाबूलाल दाहिया जी की यह पंक्ति याद आई...” जो उन्होंने नदी दिवस के दिन लिखा था चालिए दोस्तों इस लेख में हम जानते हैं उनके विचार।
नदिया तो अविरल बहने में ही अच्छी लगती हैं
नदी दिवस विशेष लेख
बाबूलाल दाहिया जी मध्यप्रदेश के सतना ज़िले के प्रसिद्ध कवि, लेखक और कृषक चिंतक हैं।
वे हिन्दी साहित्य और कृषि संस्कृति के क्षेत्र में अपने असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा पद्मश्री (Padma Shri) सम्मान से सम्मानित किए जा चुके हैं।
उनका जीवन और लेखन भारतीय ग्राम्य जीवन, लोक परंपरा, पर्यावरण और जल-जंगल-ज़मीन की संवेदनाओं से गहराई से जुड़ा है।
यह लेख उनकी चिंतनशील दृष्टि का परिणाम है, जो हमें प्रकृति और नदी के प्रति हमारी जिम्मेदारी की याद दिलाता है।
🌾 नदियों से मानव का प्राचीन संबंध
🌊 नदी दिवस 2025 – 28 सितंबर
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 28 सितंबर 2025 को दुनिया भर में नदी दिवस मनाया गया था। यह दिन हमें याद दिलाता है कि नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और सभ्यता की धड़कन हैं। हमारी नदियाँ हमें जीवन देती हैं, खेतों को सींचती हैं, पेड़ों को पोषित करती हैं और हमारे गाँवों का सौंदर्य बनाए रखती हैं। इस वर्ष का नदी दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि कैसे हम अपनी नदियों को फिर से अविरल, स्वच्छ और सदानीरा बना सकते हैं। यह दिन केवल उत्सव नहीं, बल्कि संकल्प का अवसर है — नदियों को बचाने, संरक्षण करने और उनके महत्व को समझने का।
नदियों से मनुष्य का संबंध अत्यंत प्राचीन है। प्रागैतिहासिक काल में मानव की सभी बस्तियाँ नदियों के किनारे ही बसी थीं। वही जल उसका जीवन था — पीने के लिए, नहाने के लिए, और खेती के लिए।
उन दिनों नदियाँ अविरल (लगातार बहने वाली) और सदानीरा (सदा जल से भरी) थीं।
बाबू जी के विचार _
मुझे आज भी स्मरण है — जब मैं 1956 में गाँव की पढ़ाई पूरी कर सतना नगर पढ़ने गया, तो पैदल रास्ते में पड़ने वाली सतना नदी पार करनी पड़ती थी। चैत–बैसाख की गर्मियों में भी जाँघ तक पानी रहता था।
बाज़ार जाने वाले लोग लौटते समय नदी के घाट पर बैठकर लाई, गुड़, सत्तू खाते और उसी का पानी पीते थे। यह केवल सतना नदी की नहीं, अमरन नदी की भी यही स्थिति थी।
परंतु आज?
अब किसी नदी में नहाने योग्य भी पानी नहीं बचा। आखिर पचास–साठ वर्षों में ऐसा क्या बदल गया, जबकि नदियाँ तो लाखों वर्षों से बहती आ रही थीं?
🌾 आधुनिक खेती और औद्योगीकरण का असर
इस परिवर्तन का कारण स्पष्ट है —
नई खेती की तकनीक, तेज़ी से बढ़ता औद्योगीकरण, और बदलती जीवनशैली।
सतना नदी तो टमस में मिल जाती है, पर अमरन नदी की दुर्दशा आधुनिक खेती और बढ़ती जनसंख्या का परिणाम है।
सत्तर के दशक में आई आयातित खेती तीन चीज़ों पर आधारित थी —
- उन्नत बीज
- रासायनिक उर्वरक
- सिंचाई के साधन
शुरुआत में इससे उत्पादन बढ़ा, कोई नुकसान नहीं दिखा।
परंतु जब ट्रैक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर और हजार फीट गहराई से पानी खींचने वाले पंप आए — तब प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया।
विज्ञान: वरदान या अभिशाप?
हमने बचपन में पढ़ा था —
“विज्ञान वरदान भी है और अभिशाप भी।”
सचमुच, 90 के दशक तक यह वरदान था — हैजा, चेचक, प्लेग जैसी बीमारियाँ समाप्त हुईं।
परंतु अब जब हर साल पानी के लिए हाहाकार दिखता है, सूखी नदियाँ और प्रदूषित जल देखते हैं, तो लगता है कि हम अब विज्ञान का अभिशाप भोग रहे हैं।
नदियाँ वन-पुत्री हैं, हिम-पुत्री नहीं
उत्तर भारत की नदियाँ हिमालय की गोद से आती हैं — उन्हें हिम-पुत्री कहा जाता है।
परंतु हमारे मध्य भारत की नदियाँ वन-पुत्री हैं।
उनका अस्तित्व वनों से है — यदि जंगल रहेंगे, तभी नदियाँ सदानीरा रहेंगी।
जब हम धरती से हजार फीट तक का पानी खींच लेते हैं, तो उसका सीधा असर पेड़ों और जंगलों पर पड़ता है।
इसलिए —
“यदि नदियों को बचाना है, तो पहले जंगलों को बचाना होगा।”
प्रकृति का अपना चक्र
नदी के पानी में बहकर अर्जुन (कहुआ) और जमराशिन (जंगली जामुन) जैसे बीज आते हैं, जो किनारों पर उगकर उन्हें हरा-भरा रखते हैं।
उनकी जड़ें न केवल कटाव रोकती हैं, बल्कि जल को वाष्पित होने से भी बचाती हैं।
यही प्राकृतिक संतुलन नदियों को अविरल और सदानीरा बनाए रखता है।
जब मनुष्य इस नैसर्गिक स्वरूप को नष्ट कर देता है, तो फिर उसे पुनः बहाल करने में दशकों लग जाते हैं।
मानव विकास की पुनः समीक्षा आवश्यक
मानव की प्रगति का आधार रहा है — अनुभव और अनुसंधान।
हर पीढ़ी ने अपने अनुभव अगली पीढ़ी को दिए।
अब समय आ गया है कि पिछले 50 वर्षों के विकास की भी पुनः समीक्षा की जाए।
समाधान: नदियों को पुनः सदानीरा बनाना
- नदी के उद्गम स्थल से संरक्षण आरंभ करें।
- किनारे-किनारे 15–20 मीटर तक भूमि को अतिक्रमण मुक्त करें।
- वहाँ पेड़ और प्राकृतिक जंगल विकसित करें।
- रासायनिक युक्त पानी को नदियों में जाने से रोकें।
- किसानों को जल-संरक्षण आधारित खेती के लिए प्रेरित करें।
अगर ये प्रयास किए जाएँ तो आज भी नदियों को सदानीरा बनाना संभव है।
सिर्फ “सुजलाम–सुफलाम” गाकर नहीं, बल्कि व्यवहारिक कदम उठाकर।
🌿 निष्कर्ष
सूखी नदियाँ और सोया हुआ शहर —
दोनों ही भयानक लगते हैं।
अगर हम आज नहीं जागे,
तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी।
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