समाज में बदलाव और जाति-चर्चा का सच आज का समाज तेज़ी से बदल रहा है। हर जगह विचारों, मान्यताओं और परंपराओं पर चर्चा होती है। अक्सर लोग जब किसी को बदलना चाहते हैं या उसकी सोच पर असर डालना चाहते हैं तो वे सीधे बहस या तर्क-वितर्क करने लगते हैं। लेकिन क्या सच में बदलाव इसी तरह से आता है? बदलाव की पहली सीढ़ी – समझ और सहानुभूति यदि आप किसी को बदलना चाहते हैं या उसकी सोच पर सकारात्मक प्रभाव डालना चाहते हैं, तो सबसे पहले उसके विचारों को समझना ज़रूरी है। उसकी आस्था और भावनाओं को पहचानें। यह जानने की कोशिश करें कि वह किन बातों पर विश्वास करता है और क्यों। उसकी मान्यताओं को पहले सकारात्मक रूप में स्वीकार करें, फिर धीरे-धीरे सच और इतिहास से परिचित कराएँ। याद रखिए – बहस करना नकारात्मकता लाता है, लेकिन संवाद करना एकता लाता है। परंपराओं और आस्थाओं का महत्व हमारे समाज में कोई भी परंपरा, रीत-रिवाज या मान्यता यूँ ही नहीं बनी। यह सदियों के अनुभव और सामाजिक व्यवस्था का परिणाम हैं। अगर हमें उनमें बदलाव लाना है तो सबसे पहले हमें उनका अध्ययन करना होगा। केवल आलोचना करने से लोग आपकी बात नहीं मानेंग...
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अगस्त 10, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
जन्माष्टमी – श्रीकृष्ण का जीवन, प्रेरणा और महत्त्व
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जन्माष्टमी – श्रीकृष्ण का जीवन, प्रेरणा और महत्त्व दोस्तों, जैसे कि हम सब जानते हैं, जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की स्मृति में मनाया जाता है। इस दिन घर-घर में पूजा-पाठ होता है, मंदिरों में भजन-कीर्तन गाए जाते हैं, और उनकी बाल लीलाओं की झांकियां सजाई जाती हैं। श्री कृष्ण जी का जन्म हुआ भगवान श्रीकृष्ण का नाम केवल धार्मिक ग्रंथों में ही नहीं, बल्कि टीवी सीरियल, फिल्मों और साहित्य में भी बड़े आदर से लिया जाता है। अदालतों में भी श्रीमद्भगवद् गीता की कसम दिलाई जाती है, क्योंकि गीता हिंदुओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। श्रीमद्भगवद् गीता और श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध के समय कुरुक्षेत्र में, अर्जुन को जो ज्ञान श्रीकृष्ण ने दिया, वह श्रीमद्भगवद् गीता के रूप में संकलित है। इसमें धर्म, कर्म और जीवन के सत्य को अत्यंत सरल और गहरे तरीके से समझाया गया है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण को केवल एक योद्धा या राजा नहीं, बल्कि पूर्ण भगवान का स्वरूप माना गया है। प्रकृति और प्रेम के प्रतीक श्रीकृष्ण के जीवन में— प्रकृति का सौंदर्य – गोकुल और वृंदावन की गलियों में गाय चराना, बांसु...
15 अगस्त – स्वतंत्रता दिवस का गर्वमय उत्सव हमारे गाँव 🇮🇳 धौचट में,
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15 अगस्त – स्वतंत्रता दिवस का गर्वमय उत्सव हमारे गाँव में 🇮🇳 दोस्तों, आज मैं अपने गाँव धौचट रीवा के स्कूल में गया जहाँ 15 अगस्त के उपलक्ष्य में ध्वजारोहण का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस मौके पर गाँव के कई सम्मानित लोग मौजूद थे। जनपद सदस्य रूपा सी.पी. सिंह , हमारे गाँव की सरपंच श्रीमती संध्या रत्नेश दाहिया और सहायक सचिव धर्म सिंह जी ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। धौचट स्कूल गाँव के स्कूल और ग्राम पंचायत दोनों जगह स्वतंत्रता दिवस पूरे उत्साह और सम्मान के साथ मनाया गया। तिरंगा फहराते ही बच्चों और गाँववासियों की आँखों में गर्व और खुशी की चमक साफ झलक रही थी। कार्यक्रम में राष्ट्रगान गाया गया और बच्चों ने देशभक्ति गीत व सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं। नेताओं और अतिथियों ने क्या कहा जनपद सदस्य रूपा सी.पी. सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि हमें स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को कभी नहीं भूलना चाहिए और गाँव के विकास के लिए मिलकर काम करना चाहिए। सरपंच श्रीमती संध्या रत्नेश दहिया ने शिक्षा और स्वच्छता के महत्व पर जोर देते हुए सभी को एकजुट होकर गाँव को आगे बढ़ाने का संदेश द...
PAI पोर्टल: पंचायत विकास का नया पैमाना
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PAI पोर्टल: पंचायत विकास का नया पैमाना गाँव का विकास सिर्फ़ सड़कों और इमारतों से नहीं मापा जाता, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, डिजिटल सेवाओं और आर्थिक प्रगति से भी आँका जाता है। इन्हीं सभी पहलुओं को एक जगह मापने और तुलना करने के लिए सरकार ने PAI पोर्टल यानी Panchayat Advancement Index शुरू किया है। हाल ही में हमारे गाँव की पंचायत को इसी आधार पर प्रशस्ति पत्र मिला है, जो गर्व की बात है। PAI पोर्टल क्या है? PAI (Panchayat Advancement Index) एक मूल्यांकन प्रणाली है, जिसमें ग्राम पंचायतों को उनके विकास कार्यों के आधार पर अंक और रैंक दी जाती है। यह एक तरह का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड है जो बताता है कि पंचायत किन क्षेत्रों में अच्छा कर रही है और कहाँ सुधार की ज़रूरत है। PAI का उद्देश्य पंचायतों के काम का पारदर्शी मूल्यांकन । अच्छे कामों को सम्मानित करना । विकास में पीछे रह गए क्षेत्रों की पहचान कर सुधार लाना । राज्य और ज़िले में पंचायतों के बीच सकारात्मक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना। PAI में किन बातों पर मूल्यांकन होता है? PAI कई प्रमुख श्रेणियों में पंचायत को अंक देता है: मूल...
🌾 कजलियां पर्व : प्रकृति, फसल और भाईचारे का अनोखा उत्सव
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🌾 कजलियां पर्व : प्रकृति, फसल और भाईचारे का अनोखा उत्सव 🌾 कजलियां पर्व : प्रकृति, फसल और भाईचारे का अनोखा उत्सव दोस्तों, आज मैं एक खास त्योहार एवं पारंपरिक रीति-रिवाज के बारे में बताने वाला हूँ, जो विंध्य प्रदेश में बहुत ही मायने रखता है। जैसे रक्षाबंधन के अगले दिन यहां कजलियां पर्व मनाया जाता है। यह पर्व प्रकृति से जुड़ा हुआ है और हमारे ग्रामीण जीवन में इसकी खास अहमियत है। आज हम इसकी चर्चा करेंगे। 📜 इतिहास और उत्पत्ति कजलियां पर्व की शुरुआत के बारे में कई मान्यताएं प्रचलित हैं। एक लोककथा के अनुसार, बुंदेलखंड के वीर योद्धा आल्हा-ऊदल ने अपनी बहन चंद्रावलि को शत्रुओं से बचाया था। विजय की खुशी में गांववासियों ने फसल, मिट्टी और बीज के साथ यह पर्व मनाया। तब से यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। 🌱 त्योहार की तैयारी नागपंचमी के दिन महिलाएं खेत या पवित्र स्थान से मिट्टी लाती हैं। मिट्टी को साफ बर्तनों या टोकरियों में भरकर उसमें जौ या गेहूं के बीज बोए जाते हैं। अगले सात-आठ दिनों तक इन्हें पानी दिया जाता है, जिससे हरे-भरे पौधे निकल आते हैं। यही पौधे कजलियां कहलाते हैं। ...