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शब्दों की शक्ति और सोच का बदलाव:

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"शब्दों की शक्ति और सोच का बदलाव: एक छोटी-सी रात की बातचीत" लेखक: भूपेन्द्र दाहिया हर दिन हम बात करते हैं, लेकिन आज की बातों में कुछ ऐसा हो, जिससे थोड़ी सीख मिले।" हेलो दोस्तो, मैं भूपेन्द्र दहिया, आज फिर से एक छोटी-सी लेकिन बहुत गहरी सीख आपसे साझा कर रहा हूँ, जो मुझे मेरी पत्नी के साथ एक सामान्य बातचीत के दौरान मिली। हम दोनों एक रात फोन पर बात कर रहे थे। काफी देर बातें करने के बाद मेरी पत्नी ने कहा, "चलो अब सोते हैं, मुझे सुबह उठकर काम करना होता है।" मैंने भी सहमति में कहा, “ठीक है।” लेकिन जब हम कॉल बंद करने ही वाले थे, तभी उसने मुस्कराकर कहा, "हर दिन हम बात करते हैं, लेकिन आज की बातों में कुछ ऐसा हो, जिससे थोड़ी सीख मिले।" मैंने सोचा और कहा, “ठीक है, चलो आज चर्चा करते हैं तुम्हारी दिनचर्या पर।” पत्नी ने चौंककर पूछा, “मेरी दिनचर्या में क्या खास है?” मैंने कहा, “जो तुम हर दिन करती हो, वही खास है — लेकिन जिस नजरिए से तुम उसे देखती हो, वो और भी खास हो सकता है।” उसने पूछा, “कैसे?” मैंने समझाया, “तुम अपने कामों को जैसे करती हो, उसमें अक्सर ...