लोक की ताकत आज भी बरकरार है | बाबूलाल दाहिया के अनुभवों से किसान की सच्चाई
![]() |
| लोक की ताकत आज भी बरकरार है |
—पद्मश्री बाबूलाल दाहिया जी
मित्रों!
लोक का प्राचीन समय से ही विशेष महत्व रहा है। शायद इसी कारण लोक से जुड़े अनेक शब्द बने — लोककथा, लोकगीत, लोकगाथा, लोकपरंपरा। यहाँ तक कि हमारे लोकतंत्र और उसके सबसे बड़े सदन को भी लोकसभा कहा गया।
यह इस बात का प्रमाण है कि भारत की आत्मा आज भी लोक में बसती है।
लोक के सबसे बड़े पैरोकार कबीर थे। उन्होंने कागज की लिखी विद्या से अधिक अनुभव की विद्या को महत्व दिया —
तू कहता कागद की लेखी,
मैं कहता आँखन की देखी।
आज भी कबीर की यह “आँखन देखी” सच्चाई उतनी ही प्रासंगिक है।
विश्वविद्यालय में किसान की आवाज़
कोरोना काल से एक वर्ष पहले मुझे दिल्ली के मिरांडा हाउस विश्वविद्यालय के पॉलिटिकल साइंस विभाग में व्याख्यान हेतु आमंत्रित किया गया।
विषय था —
“Stories from a Farmer on Challenges Faced by the Farming Community”
मेरे साथ कई बड़े विद्वान और वैज्ञानिक भी थे, जिन्होंने आधुनिक कृषि विज्ञान की मोटी-मोटी किताबें पढ़कर पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन तैयार किया था।
उनके सुझाव तकनीकी थे — पर छात्रों और प्राध्यापकों को उबाऊ लग रहे थे।
जब मेरी बारी आई —
मैंने लोकोक्तियों, मुहावरों और जीवंत अनुभवों के साथ किसान की वास्तविक समस्याएँ रखीं।
तब सभागार में सन्नाटा छा गया —
क्योंकि यह कागज की नहीं, आँखन देखी सच्चाई थी।
आज की खेती की सच्चाई
मैंने बताया —
✔ किसान के उत्पाद का मूल्य और अन्य वर्गों की आय में भारी असंतुलन है।
उत्पाद मूल्य में असंतुलन आज किसान के उत्पाद का मूल्य और अन्य वर्गों की आय में भारी असंतुलन है। किसान दिन-रात मेहनत करता है, फिर भी उसकी उपज का उचित दाम उसे नहीं मिल पाता।
✔ गाँव के सहायक कारीगर रोजगार छोड़ शहर पलायन कर गए।
गाँव के कारीगरों का पलायन गाँव के सहायक कारीगर, जो कभी कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे, रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं।
✔ मजदूर भी गाँव से शहर चला गया।
मजदूरों का गाँव छोड़ना खेती में पर्याप्त मजदूरी न मिलने के कारण गाँव का श्रमिक वर्ग भी शहर जाकर दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हो गया है।
✔ खेती पूरी तरह मशीनीकरण पर निर्भर हो गई।
मशीनीकरण पर निर्भर खेती आज खेती पूरी तरह मशीनीकरण पर निर्भर हो गई है। इससे उत्पादन तो बढ़ा, पर लागत भी कई गुना बढ़ गई।
✔ किसान बाजार और मशीन दोनों पर आश्रित हो गया।
बाजार और मशीन का दबाव किसान अब बाजार और मशीन दोनों पर आश्रित हो गया है। बीज से लेकर खाद और उपकरण तक सब कुछ खरीदना पड़ता है।
✔ लागत बढ़ी, कर्ज बढ़ा।
लागत और कर्ज का बढ़ता बोझ खेती की बढ़ती लागत ने किसान को कर्ज के जाल में फँसा दिया है। मेहनत अधिक है, पर लाभ कम।
✔ आज कोई किसान-पुत्र खेती करना नहीं चाहता।
खेती से दूर होता किसान-पुत्र आज स्थिति यह है कि कोई किसान-पुत्र खेती को अपनाना नहीं चाहता। उसे भविष्य असुरक्षित दिखाई देता है।
यह केवल आर्थिक नहीं — सांस्कृतिक संकट भी है।
पेट की खेती से सेठ की खेती तक
एक समय था जब गाँव की खेती पेट की खेती थी —
आज वह सेठ की खेती बन गई है।
एक समय था जब गाँव का किसान अपनी खेती खुद करता था। वह अनाज उगाता था, और उसी से अपने परिवार का पेट भरता था। इसलिए उसे कहा जाता था —
पेट की खेती। उस समय खेती जीवन चलाने का साधन थी, बाजार का खेल नहीं। लेकिन आज समय बदल गया है। अब खेती में बीज, खाद, दवा, मशीन —
सब कुछ बाजार से खरीदना पड़ता है। फसल बिकती भी बाजार के भाव पर है। यानि —
अब खेती किसान की नहीं, सेठ और बाजार की खेती बन गई है। किसान खेत में मेहनत करता है, लेकिन मुनाफा बीज बेचने वाला, दवा बेचने वाला, और व्यापारी कमा लेते हैं। इसीलिए कहा गया है —
हरे-भरे खेतों से किसान को उतना ही लाभ मिलता है, जितना 10 लीटर दूध देने वाली भैंस के बच्चे को दूध!
यह तुलना सुनकर सभागार स्तब्ध रह गया —
क्योंकि यही आज का यथार्थ है।
जैविक खेती और उपभोक्ता की जिम्मेदारी
जब मुझसे ऑर्गेनिक फार्मिंग पर प्रश्न हुआ,
मैंने कहा —
70 के दशक में व्यक्ति अपनी आय का 50% भोजन पर खर्च करता था।
तब भोजन पूरी तरह विषरहित और जैविक होता था।
आज स्थिति यह है —
लोग आय का 5% भी भोजन पर खर्च नहीं करना चाहते।
इसलिए अनाज और सब्जियाँ
रसायन से उगाई और जहर से स्नान कराई हुई मिलती हैं।
समाधान स्पष्ट है —
यदि हर उपभोक्ता अपनी आय का कम से कम 15% भोजन पर खर्च करे,
तो किसान को उचित मूल्य मिलेगा
और समाज को विषरहित भोजन।
फैमिली डॉक्टर नहीं — अब फैमिली किसान की जरूरत
आज हर घर में डॉक्टर की जरूरत पड़ती है। बीमारी होने पर हम तुरंत डॉक्टर के पास जाते हैं। यह सही भी है, क्योंकि स्वास्थ्य सबसे बड़ी संपत्ति है। लेकिन अब सोचिए —
हम बीमार क्यों पड़ रहे हैं?
आज की खेती में कीटनाशक दवाइयाँ, रासायनिक खाद और जहरीले स्प्रे का बहुत अधिक उपयोग हो रहा है। इसी कारण हमारे भोजन में धीरे-धीरे जहर मिल रहा है। अगर यही चलता रहा, तो आने वाले समय में डॉक्टर भी इन नई बीमारियों का इलाज नहीं कर पाएंगे। इसलिए अब समय आ गया है कि हम बीमारी का इलाज नहीं, बीमारी की जड़ को रोकें।
समाधान सरल है —
हर परिवार एक “फैमिली किसान” बनाए।
यानि —
किसी एक भरोसेमंद किसान से सीधा जुड़ें, जो आपको जहर-मुक्त अनाज और सब्जियाँ दे। और बदले में आप उसे उचित और सम्मानजनक मूल्य दें।
इससे —
✔ परिवार को शुद्ध भोजन मिलेगा
✔ किसान को सही दाम मिलेगा
✔ और समाज स्वस्थ बनेगा
यही है —
लोक की ताकत, आज भी बरकरार।
हर परिवार एक “फैमिली किसान” बनाए,
जो उन्हें जहर मुक्त अनाज दे
और बदले में सम्मानजनक मूल्य पाए।
कबीर की आँखन देखी आज भी असरदार
कहना न होगा —
कबीर की शैली में कही गई मेरी आँखन देखी बातें सभागार में सबसे अधिक प्रभावी सिद्ध हुईं।
क्योंकि —
लोक की ताकत आज भी बरकरार है।
✨ निष्कर्ष
लोक केवल अतीत नहीं —
वह भविष्य का मार्गदर्शक है। लोक कोई बीता हुआ कल नहीं है। लोक हमारी जड़ों की शक्ति है, और वही हमें भविष्य का रास्ता दिखाता है। जिस दिन किसान की आवाज़, लोकबुद्धि की समझ और अनुभव की सीख हमारे जीवन में जीवित रहेगी उस दिन तक भारत की आत्मा जीवित रहेगी। क्योंकि लोक की ताकत आज भी बरकरार है। जब तक किसान, लोकबुद्धि और अनुभव जीवित है —
भारत की आत्मा जीवित है।
📢 विनम्र निवेदन
यदि यह लेख आपको विचारणीय लगा हो —
✔ इसे शेयर करें
✔ किसानों की आवाज़ बनें
✔ लोक की शक्ति को आगे बढ़ाएँ
जल्द ही अगला लेख लेकर आ रहा हूँ — जुड़े रहिए।
✍️ प्रस्तुति :
भूपेंद्र दाहिया
(बाबूलाल दाहिया जी के अनुभवों पर आधारित)
🛒 शुद्ध भोजन और स्वस्थ जीवन के लिए सुझाव
अगर आप भी जहर-मुक्त भोजन अपनाना चाहते हैं, तो नीचे दिए उपयोगी उत्पाद देखें:
🌾 देसी और ऑर्गेनिक अनाज
👉 यहाँ देखें: https://fktr.in/dwlDqfa
🌱 घर पर सब्जी उगाने की बीज किट
👉 यहाँ देखें: https://fktr.in/Loib25f



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
“अगर पोस्ट पसंद आई हो तो साझा करें और अपने सुझाव बताएँ।”