विश्व हिन्दी दिवस और धान के मेरखुआ-टुटेशन की रोटी ✍️ लेखक : बाबूलाल दाहिया

नमस्कार दोस्तों,
आज हम पद्मश्री बाबूलाल दाहिया जी द्वारा रचित उस विशेष लेख से परिचित होने जा रहे हैं, जिसमें उन्होंने बताया है कि भारत में धान की लगभग 200 से अधिक किस्में प्रचलित हैं।
इन किस्मों के कई नाम कभी हमारी स्थानीय बोलियों में प्रचलित थे, लेकिन समय के साथ वे इतने व्यापक रूप से उपयोग में आए कि आज वे हिन्दी भाषा के स्थायी शब्द बन चुके हैं। यह लेख केवल धान की किस्मों का परिचय नहीं,
बल्कि हिन्दी भाषा के निर्माण में लोकबोलियों के अमूल्य योगदान की जीवंत झलक है।
आज पद्मश्री बाबूलाल दाहिया जी गुजरात प्रवास में हैं,
और वहीं से यह महत्वपूर्ण ज्ञान-सृजन हम तक पहुँचा रहे हैं।
आइए, उनके इस विचार-यात्रा में सहभागी बनें…


लोकभाषा और संस्कृति पर विशेष लेख
लेखक : पद्मश्री बाबूलाल दाहिया जी
प्रस्तुति : भूपेंद्र दाहिया

विश्व हिन्दी दिवस को गुज़रे अब कुछ दिन हो चुके हैं, लेकिन हिन्दी और उसकी लोकबोलियों पर चिंतन का अवसर कभी समाप्त नहीं होता। इसी भाव के साथ यह लेख प्रस्तुत है —

 जहाँ भाषा, कृषि और संस्कृति एक साथ बोलती हैं।


लोकभाषा और संस्कृति पर विशेष लेख
लेखक : पद्मश्री बाबूलाल दाहिया जी

मित्रों!
अभी बीते दिनों विश्व हिन्दी दिवस था और आज मैं गुजरात के लोकनिकेतन में आयोजित एक विशाल किसान स्वराज सम्मेलन में उपस्थित हूँ। यहाँ देशभर से आए परंपरागत बीज संरक्षकों और पारंपरिक उत्पादों के 35 स्टॉल लगे हैं।
इनमें एक स्टॉल हमारी संस्था सर्जना का भी है, जहाँ 200 प्रकार के देशी धान और अनेक पारंपरिक बीज प्रदर्शित किए गए हैं।

धान की खेती करने वाले किसान जानते हैं कि धान से केवल चावल ही नहीं, बल्कि मेरखुआ और टुटेशन जैसे विशेष अंश भी निकलते हैं, जिनसे स्वादिष्ट और पौष्टिक रोटियाँ बनती हैं।

पर क्या मेरखुआ और टुटेशन हिन्दी के शब्द हैं?
नहीं — ये बघेली बोली के शब्द हैं, जो हिन्दी की समृद्ध उपभाषाओं में से एक है।

हिन्दी उत्तर भारत के 7–8 राज्यों की भाषा है, जिसके अंदर बघेली जैसी 17–18 उपभाषाएँ या बोलियाँ हैं। अगर हिन्दी विश्व की भाषा बनी है, तो अपने इसी संख्या-बल से। अगर विदेशियों को हमें अपने उत्पाद बेचने होंगे, तो झख मारकर उन्हें हमारी हिन्दी सीखनी होगी — ठीक उसी प्रकार जैसे दक्षिण भारत के अहिन्दी भाषी टैक्सी, ऑटो, ओला-उबर के ड्राइवर सीखते हैं, और अपनी वस्तुएँ बेचने वाले व्यापारी सीखते हैं।

यदि हिन्दी आज विश्व भाषा बनी है, तो इसका बड़ा कारण उसकी बोलियों की शक्ति और जन-आधार है।


धान हमारे क्षेत्र का अत्यंत प्राचीन अनाज है।
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में इसके अवशेष मिले हैं।
जब तक फारसी शब्द अनाज प्रचलन में नहीं आया था, तब सभी अन्न को धान्न कहा जाता था। लघुधान्न में कोदो, कुटकी, सावां, काकुन, मडुवा, बाजरा, ज्वार जैसे अन्न आते थे — जिन्हें आज मोटे अनाज कहा जाता है। धान का छिलका उतारने पर जो भाग निकलता है, वह चावल कहलाता है —
अर्थात जिसे चबाते ही शरीर में बल आ जाए।


धान की कुटाई (ओखली या चक्की में कूटने) के बाद जब भूसी अलग हो जाती है, तो शेष दानों से चार प्रमुख अंश प्राप्त होते हैं। ग्रामीण भाषा में इनके अलग-अलग नाम और उपयोग प्रचलित हैं जब तक फारसी का लोकप्रिय शब्द “अनाज” प्रचलन में नहीं आया था, और गेहूँ-चना आदि बाहर के अन्न यहाँ नहीं पहुँचे थे, तब तक सभी अनाज “धान्न” और “लघुधान्न” कहलाते थे।
धान्न तो अपना धान ही था,
और लघुधान्न में — कोदो, कुटकी, सावां, काकुन, मड़ुवा, बाजरा, ज्वार आदि आते थे — जो आज मोटे अनाज या माइनर मिलेट्स कहलाते हैं।
धान का छिलका उतारने के बाद उसका जो भाग निकलता है, उसे चावल कहते हैं।
(चावलम्) — यानी जिसे चबा लेने से शरीर में तुरंत बल आ जाए।
पहले चावल एक घंटे पानी में भिगोकर कच्चा भी नाश्ते के रूप में चबाया जाता था।
पर वह बिना कुटा चावल बगरी कहलाता है, जिसमें खाने में गुरतल-पन होता है।
बहुत से हिन्दी के विद्वानों को अभी तक यह भी पता नहीं होगा कि धान से दराई करके चावल निकालते समय भूसी अलग होने के बाद उसके चार भाग और बनते हैं,
धान कुटाई के बाद भूसी अलग होने पर चार भाग निकलते हैं —1. किनकी 2. टुटेशन 3. मेरखुआ 4. कना

1. किनकी
यह धान कुटाई के बाद निकलने वाला सबसे बारीक अंश होता है। यह लगभग आटे जैसी महीन परत होती है।इसे सामान्यतः पशुओं के चारे में मिलाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे हल्का पौष्टिक खाद्य भी माना जाता है।

2. टुटेशन
जब चावल के दाने कुटाई में टूट जाते हैं, तो उनके छोटे-छोटे टुकड़े निकलते हैं —
इन्हें टुटेशन कहा जाता है। गरीब ग्रामीण परिवार इन्हें उबालकर भोजन के रूप में प्रयोग करते हैं। आज भी कई स्थानों पर इससे खीर या दलिया बनाया जाता है।

3. मेरखुआ
रही बात धान के मेरखुआ–टुटेशन की — तो ये धान से निकलते हैं, और धान हमारे क्षेत्र का बहुत पुराना अनाज है। 
यह आधा टूटा हुआ चावल होता है। न पूरा चावल, न पूरी तरह टुटा हुआ। इसे साधारण चावल की तरह पकाया जाता है।
स्वाद में हल्का, जल्दी पकने वाला और सुपाच्य माना जाता है।

4. कना
यह सबसे शुद्ध और साबुत चावल का दाना होता है। इसे ही मुख्य भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है। शादी-ब्याह, पूजा और विशेष अवसरों में इसी कना चावल का उपयोग होता है।

चावल और किनकी से भात बनता है। कना पशुओं को खिलाया जाता है। टुटेशन और मेरखुआ को पीसकर विशेष रोटियाँ बनाई जाती हैं। इनकी मात्रा बहुत कम निकलती है,
इसलिए इन रोटियों का आनंद वर्ष में केवल 10–15 दिन ही मिलता है

भात और रोटी की तासीर में भी बड़ा अंतर है। भात की तासीर ठंडी होती है, रोटी की तासीर गर्म। इसीलिए रोटी अगहन से माघ तक खाई जाती है, जिससे शीतजनित बीमारियाँ नहीं होतीं। उसके बाद धान की रोटी खाने से गर्म तासीर के कारण पेट में जलन होने लगती है।

इन रोटियों को तभी खाया जा सकता है जब साथ में—
किनकी कि रोटी चना भाजी 

दो हिस्सा सब्जी या भुर्ता
चने की भाजी
हरी लहसुन-धनिया में पिसा हुआ नमक
अवश्य हो।


थोड़ी-थोड़ी मात्रा में आटे को मांडते जाएँ और हाथ से पोते भी जाएँ, क्योंकि बेलन-चौकी इसमें काम नहीं करते।

इन रोटियों के साथ
भुर्ता, चने की भाजी और हरी लहसुन-धनिया में पिसा नमक
अनिवार्य होता है। धान की रोटी बेलन से नहीं, हाथ से पोतकर बनाई जाती है।


ये चारों शब्द —
किनकी, टुटेशन, मेरखुआ, कना —
हमारी ग्रामीण बोलियों से जन्मे शब्द हैं।
आज ये इतने प्रचलित हो चुके हैं
कि हिन्दी शब्दावली का स्थायी हिस्सा बन गए हैं।

यही है लोकबोली से हिन्दी निर्माण की सुंदर परंपरा,
जिसे पद्मश्री बाबूलाल दाहिया जी ने अपने लेखों में सहेजा है।


हिन्दी अनेक राज्यों की संपर्क भाषा है। हिन्दी सात–आठ राज्यों की 14–15 बोलियों के बीच की संपर्क भाषा तो बनी हुई है, पर खुद वस्तुओं के नाम नहीं बनाती। नाम तो उसकी लोक भाषाएँ ही बनाती हैं। जैसे बघेली बोली में धान के टुकड़ों के पाँच नाम हैं। इसीलिए तमाम बोलियाँ हिन्दी की दादी–नानी नहीं, बल्कि परदादी से कम नहीं हैं —
जिनमें खेत की तैयारी से लेकर, उगाने, निंदाई, कटाई और थाली में आई रोटी परोसने तक दो–ढाई सौ शब्द बन जाते हैं।
लेकिन वे शब्द भाषाओं के नहीं, बोलियों के होते हैं। पर वस्तुओं के असली नाम बोलियाँ ही गढ़ती हैं। बघेली बोली में धान के टुकड़ों के कई नाम हैं। खेत की तैयारी से थाली में रोटी परोसने तक
सैकड़ों शब्द बनते हैं —
जो भाषाओं में नहीं, बोलियों में जन्म लेते हैं।

इसलिए कहा जा सकता है —
यदि हिन्दी शरीर है, तो बोलियाँ उसकी आत्मा हैं।


कल्पना कीजिए —
आदिम मानव के आसपास एक अनजान जीव आया, सूखे पत्तों में सर-सर की आवाज हुई।

पहली बार उसने काटा — मृत्यु हुई।
दूसरी बार वही जीव दिखा —
डर के मारे मुख से निकला — “सर-सर!”

तीसरी बार किसी ने लाठी से प्रहार किया —
ध्वनि हुई — “सप्प!”

यही सर-सर-सप्प
कालांतर में बना — सर्प और साँप।

यह पूरी प्रक्रिया
किसी शुद्ध हिन्दी में नहीं,
लोकबोली में घटी होगी।

आदिम मानव के आसपास एक जीव आया —
सूखे पत्तों में सर-सर की आवाज हुई। पहली बार उसने काटा — मृत्यु हुई। दूसरी बार वही जीव दिखा — डर से मुख से निकला — “सर-सर!” तीसरी बार लाठी से प्रहार हुआ —
ध्वनि निकली — “सप्प!”

यही सर-सर–सप्प कालांतर में बना — सर्प और साँप। यह प्रक्रिया किसी शुद्ध भाषा में नहीं, लोकबोली में घटी।


लोकबोलियाँ ही
हमारी संस्कृति, खेती और जीवन-परंपरा की सच्ची संवाहक हैं।
बोलियाँ जीवित रहें — तभी हिन्दी जीवित रहेगी। हिन्दी की शक्ति उसकी बोलियों से आती है। हमारी लोकभाषाएँ ही
हमारी संस्कृति, कृषि और जीवन-परंपरा की असली संवाहक हैं।


✍️ मूल लेख : पद्मश्री बाबूलाल दाहिया जी
🖋️ प्रस्तुति : भूपेंद्र दाहिया

विश्व हिन्दी दिवस की प्रेरणा से —
धान के मेरखुआ-टुटेशन की रोटी और लोकबोलियों की अद्भुत विरासत।
पढ़िए और साझा कीजिए।

🔸 विशेष सूचना:
अगर आप भी देशी धान, कोदो-कुटकी, बाजरा या पारंपरिक बीज घर बैठे मंगाना चाहते हैं, 
तो नीचे दिए गए लिंक से विश्वसनीय उत्पाद देख सकते हैं।

👉 यहाँ क्लिक करें: 
https://fktr.in/I9Sp9bl 

https://fktr.in/6sqW1gg

(यह एक Affiliate लिंक है। इससे खरीदने पर आपको कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ता, 
लेकिन इससे हमारे ब्लॉग को आगे बढ़ाने में सहयोग मिलता है।)


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

🌺 “दाहिया दहायत चेतना सृजन बुक” — समाज चेतना की यात्रा से मातृशक्ति सम्मान तक

डिजिटल हेल्थ मैनेजमेंट पुस्तक – AI से बदलता स्वास्थ्य भविष्य सोनू दहायत

ग्रेजुएशन bhhpendrablog.com