शिक्षक दिवस
नमस्कर दोस्तो!
जैसे हम सब जानते हैं सितम्बर का महीना सुरू हों गया है। मैं जब कॉलेज और स्कूल में पढ़ता था महिने सुरू होने से पहले एक ख़ास दिन कि तैयारी सुरू कर देते थे। आज भले हि स्कूल कॉलेज में नहीं तो भी आप लोगों के साथ उस ख़ास दिन कि चर्चा करूंगा और वो ख़ास दिन हैं शिक्षक दिवस तो दोस्तों मैं चर्चा इस तरह से होंगी कि महा पुरुष पर निबन्ध भी लिख सकते हैं तो चालिए दोस्तों सुरू करते हैं,
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन – शिक्षक दिवस के महानायक
जब भी शिक्षक दिवस (5 सितम्बर) की बात आती है, तो सबसे पहले याद आते हैं डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन। वे केवल भारत के राष्ट्रपति ही नहीं बल्कि एक महान शिक्षक और विचारक भी थे।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को आंध्र प्रदेश में हुआ था। वे बचपन से ही बहुत होशियार और पढ़ाई के शौकीन थे। उन्होंने दर्शनशास्त्र (Philosophy) की पढ़ाई की और इसी विषय में आगे बड़े विद्वान बने।
जब वे भारत के राष्ट्रपति बने, तब उनके छात्रों और दोस्तों ने उनका जन्मदिन (5 सितम्बर) मनाने की इच्छा जताई।
इस पर डॉ. राधाकृष्णन ने बहुत ही विनम्रता से कहा –
“मेरा जन्मदिन अलग से मनाने के बजाय अगर इसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो मुझे ज़्यादा खुशी होगी।”
यानी वे चाहते थे कि उनके जन्मदिन का महत्व सिर्फ उनके लिए न होकर, सभी शिक्षकों के सम्मान के रूप में हो। तभी से हर साल 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है।
शिक्षा और अध्यापन कार्य
उन्होंने कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अध्यापन किया। कठिन विषयों को भी वे बहुत ही आसान भाषा में समझाते थे। उनके छात्र उन्हें बहुत मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा का असली काम इंसान को अच्छा और ईमानदार बनाना है।
राष्ट्रपति और सम्मान
डॉ. राधाकृष्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति (1952–1962) और फिर दूसरे राष्ट्रपति (1962–1967) बने। उन्हें शिक्षा और दर्शन के क्षेत्र में योगदान के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
शिक्षक दिवस की शुरुआत
जब उनके छात्रों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा जताई, तो उन्होंने कहा –
“मेरा जन्मदिन मनाने की बजाय इसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाओ।”
इसी कारण हर साल 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है।
उनकी विचारधारा
- शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि इंसान को अच्छा बनाना है।
- सब इंसान बराबर हैं, जाति-धर्म से ऊपर उठकर भाईचारा ज़रूरी है।
- शिक्षक समाज की असली नींव होते हैं।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन हमें यह सिखाता है कि ज्ञान ही असली शक्ति है और शिक्षा ही असली पूंजी। हमें हमेशा अपने शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि वही हमारे भविष्य की राह दिखाते हैं।
भारत में हर साल 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस पर मनाया जाता है। वे एक महान शिक्षक और विद्वान थे। उन्होंने हमेशा कहा कि शिक्षक का सम्मान करना ही असली परंपरा होनी चाहिए।
लेकिन अगर हम शिक्षा के असली इतिहास को देखें, तो हमें सावित्रीबाई फुले और उनके पति महात्मा ज्योतिराव फुले का नाम सबसे पहले लेना चाहिए।
आज मैं "असली शिक्षक दिवस कौन-सा?" विषय पर अपने विचार रखना चाहता हूँ।
हम सब जानते हैं कि भारत में 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमारे पूर्व राष्ट्रपति और महान शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की याद में मनाया जाता है। उनका मानना था कि शिक्षा ही इंसान को महान बनाती है और शिक्षक ही असली मार्गदर्शक होते हैं।
लेकिन दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि भारत की पहली महिला शिक्षिका कौन थीं?
वो थीं सावित्रीबाई फुले।
उन्होंने 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। उस समय समाज में लड़कियों को पढ़ाना अपराध समझा जाता था, लेकिन सावित्रीबाई फुले ने साहस और हिम्मत से शिक्षा का दीपक जलाया।
इसी कारण कई लोग मानते हैं कि असली शिक्षक दिवस तो 3 जनवरी को होना चाहिए, क्योंकि यही दिन सावित्रीबाई फुले का जन्मदिवस है।
अंत में मैं कहना चाहूँगा कि—
5 सितम्बर हमें शिक्षकों के सम्मान की याद दिलाता है।
और 3 जनवरी हमें शिक्षा में समानता और अधिकार की सीख देता है।
हम सबको दोनों महान व्यक्तित्वों से प्रेरणा लेनी चाहिए और अपने सभी शिक्षकों को हृदय से सम्मान देना चाहिए।
दोस्तों यहां मैं शिक्षक दिवस के बारे जानकारी देने का छोटा प्रयास किया हूं दोस्तों अभी कुछ दिनों से मैं थोड़ा ड्यूटी के चलते व्यस्त चल रहा था मैं बहुत सारे ब्लॉग का टॉपिक और अपके जनरल नालेज कि चीज़ लाऊंगा तब तक आप मेरे पेज में जाके बहुत से मेरे ब्लॉग पढ़ते रहें दोस्तों आप लोगों से मेरी विनती है मेरा सहयोग करे ब्लाग को लोगो शेयर करें।
अपका अपना मित्र
लेखक: भूपेंद्र दाहिया

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